टॉम ऑल्टर: भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने अभिनय से कहीं अधिक अपने व्यक्तित्व से लोगों के दिलों में जगह बनाई। टॉम ऑल्टर उन्हीं चुनिंदा नामों में शामिल हैं। नीली आंखें, गोरा रंग और विदेशी व्यक्तित्व होने के कारण लोग उन्हें अक्सर अंग्रेज समझ बैठते थे, लेकिन सच यह है कि उनका दिल भारत के लिए धड़कता था।
अभिनेता, लेखक, पत्रकार, रंगकर्मी और उर्दू प्रेमी के रूप में उन्होंने जिस तरह भारतीय संस्कृति को अपनाया, वह उन्हें अपने दौर के सबसे अलग कलाकारों में शामिल करता है। 22 जून को उनकी जयंती के अवसर पर आइए जानते हैं उस शख्सियत की कहानी जिसने साबित किया कि भारतीय होने के लिए जन्म नहीं, बल्कि भावना मायने रखती है।
अमेरिका से आया परिवार, लेकिन भारत बन गया घर
22 जून 1950 को उत्तराखंड के खूबसूरत शहर मसूरी में जन्मे टॉम ऑल्टर का परिवार मूल रूप से अमेरिका के ओहायो से भारत आया था। उनके दादा-दादी मिशनरी कार्यों के लिए भारत पहुंचे थे और बाद में यहीं बस गए। मसूरी और देहरादून की वादियों में बीता उनका बचपन भारतीय संस्कृति के बेहद करीब रहा। हिंदी, गढ़वाली और उर्दू भाषाओं के प्रति उनका लगाव बचपन से ही दिखाई देने लगा था। यही वजह थी कि आगे चलकर लोग उनके व्यक्तित्व को विदेशी और उनकी आत्मा को भारतीय बताते थे।
अमेरिका गए, लेकिन मन भारत में ही रहा
युवावस्था में उच्च शिक्षा के लिए उन्हें अमेरिका भेजा गया। उस दौर में विदेश जाना बड़ी उपलब्धि माना जाता था, लेकिन टॉम ऑल्टर का अनुभव अलग रहा। अमेरिका पहुंचने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि उनका मन वहां की जीवनशैली में नहीं रमता। कुछ समय बाद वे भारत लौट आए। उन्होंने शिक्षक के रूप में काम किया, अस्पताल में नौकरी भी की, लेकिन अंततः उन्हें समझ आ गया कि उनका भविष्य भारत में ही है। यही निर्णय आगे चलकर भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ी सौगात साबित हुआ।
एक फिल्म जिसने बदल दी जिंदगी
साल 1970 में टॉम ऑल्टर ने सुपरस्टार Rajesh Khanna की फिल्म आराधना देखी। फिल्म ने उन पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि उन्होंने अभिनय को ही अपना करियर बनाने का फैसला कर लिया। इसके बाद उन्होंने Film and Television Institute of India में दाखिला लिया और अभिनय की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। उसी संस्थान में उनके जूनियर के रूप में Naseeruddin Shah और Om Puri जैसे कलाकार थे, जबकि Shabana Azmi उनकी सीनियर थीं।
जब चेहरा बन गया सबसे बड़ी चुनौती
टॉम ऑल्टर की सबसे बड़ी चुनौती उनका विदेशी रूप था। फिल्म निर्माताओं को उनमें अक्सर अंग्रेज अधिकारी, विदेशी सैनिक या पश्चिमी किरदार दिखाई देते थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। उन्होंने हर भूमिका को पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ निभाया। धीरे-धीरे दर्शकों ने उन्हें उनके चेहरे से नहीं, बल्कि उनके अभिनय से पहचानना शुरू कर दिया।
100 से ज्यादा फिल्मों में छोड़ी अमिट छाप
चार दशक से अधिक लंबे करियर में टॉम ऑल्टर ने 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। उन्होंने हिंदी के अलावा बंगाली, असमी और मलयालम फिल्मों में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। उनकी प्रमुख फिल्मों में Kranti, Gandhi, Aashiqui, Veer-Zaara, Parinda, Ram Teri Ganga Maili और Tridev जैसी चर्चित फिल्में शामिल हैं।
शक्तिमान के महागुरु को कौन भूल सकता है
90 के दशक के बच्चों के लिए टॉम ऑल्टर का सबसे यादगार किरदार था महागुरु। लोकप्रिय टीवी शो Shaktimaan में उन्होंने महागुरु का ऐसा प्रभावशाली किरदार निभाया जिसे आज भी लोग याद करते हैं। उनकी गंभीर आवाज, शांत व्यक्तित्व और प्रेरणादायक संवादों ने इस चरित्र को अमर बना दिया।
जब सचिन का इंटरव्यू दुनिया से पहले किया
बहुत कम लोग जानते हैं कि टॉम ऑल्टर एक बेहतरीन खेल पत्रकार भी थे। 1988 में उन्होंने एक 16 वर्षीय युवा क्रिकेटर का इंटरव्यू लिया था। उस खिलाड़ी का नाम था Sachin Tendulkar। बाद में यही युवा क्रिकेटर विश्व क्रिकेट का सबसे बड़ा नाम बना। आज वह इंटरव्यू भारतीय खेल पत्रकारिता के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।

उर्दू से बेइंतहा मोहब्बत
टॉम ऑल्टर का उर्दू प्रेम किसी से छिपा नहीं था। वे उर्दू साहित्य पढ़ते थे, शायरी से प्रेम करते थे और मंच पर बेहद खूबसूरती से उर्दू बोलते थे। उनकी भाषा पर पकड़ देखकर कई लोग हैरान रह जाते थे। विदेशी चेहरा होने के बावजूद भारतीय भाषाओं के प्रति उनका समर्पण उन्हें दूसरों से अलग बनाता था।
अधूरे रह गए कुछ सपने
जीवन के अंतिम वर्षों में टॉम ऑल्टर गढ़वाली फिल्मों में काम करना चाहते थे। वे अपने अंतिम दिन पहाड़ों की शांत वादियों में बिताने का सपना भी देखते थे। लेकिन 29 सितंबर 2017 को कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
एक कलाकार नहीं, एक विचार थे टॉम ऑल्टर
टॉम ऑल्टर का जीवन हमें सिखाता है कि पहचान केवल जन्मस्थान या चेहरे से नहीं बनती, बल्कि विचारों, संस्कारों और कर्मों से बनती है। न्होंने अभिनय, थिएटर, पत्रकारिता और साहित्य के माध्यम से भारतीय समाज को समृद्ध किया। यही कारण है कि आज भी उनका नाम भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित कलाकारों में लिया जाता है। उनकी कहानी केवल एक अभिनेता की जीवनी नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की प्रेरक यात्रा है जिसने साबित किया कि सच्चा भारतीय बनने के लिए भारत से प्रेम करना ही सबसे बड़ी शर्त है।
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